आरक्षित वनों के साथ-साथ सिविल वनों को भी हुआ भारी नुकसान

Date/01/05/2026

देहरादून । उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में इस साल वनाग्नि ने तय समय से पहले ही भयावह रूप लेना शुरू कर दिया है। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में ही आग की घटनाओं ने बीते वर्षों के आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया था। इससे जंगलों पर बढ़ते संकट की तस्वीर साफ दिखने लगी है। वन विभाग के अनुसार अब तक वनाग्नि की 145 से अधिक घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं।

वनाग्नि की इन 145 घटनाओं में आरक्षित और सिविल दोनों वन क्षेत्र प्रभावित हुए हैं। करीब 96।08 हेक्टेयर जंगल जलकर खाक हो चुके हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लगभग 40 प्रतिशत अधिक जंगलों का नुकसान हुआ है, जो संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों का असर अब अधिक स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है। जंगलों में सूखी पत्तियां और बढ़ती गर्मी आग को तेजी से फैलाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। अभी तो अप्रैल का महीना ही बीता है जबकि पूरी गर्मी अभी बाकी है।

गढ़वाल क्षेत्र इस समय वनाग्नि का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। यहां अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक ही वनाग्नि की 100 से अधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बदरीनाथ वन प्रभाग में सर्वाधिक आग की घटनाएं दर्ज हुई हैं। रुद्रप्रयाग सहित अन्य क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर जंगल प्रभावित हुए हैं। यहां आरक्षित वनों के साथ-साथ सिविल वनों को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ रहा है। आग के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। वनाग्नि से घबराकर और बचने के लिए वे आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं। लगातार बढ़ते तापमान, नमी की कमी और कई मामलों में मानवीय लापरवाही इस संकट को और गंभीर बना रही है। इससे न केवल जंगलों की हरियाली घट रही है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों की आजीविका पर भी सीधा असर पड़ रहा है।

वनाग्नि का प्रभाव अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर वायु गुणवत्ता पर भी साफ नजर आने लगा है। पहाड़ों की स्वच्छ हवा अब धुएं और प्रदूषण से प्रभावित हो रही है, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक कई जगहों पर चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। आग से निकलने वाला धुआं और ब्लैक कार्बन वातावरण में घुलकर तापमान को और बढ़ा रहा है, जिससे गर्मी का असर और तेज हो रहा है। इससे सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है और आम लोगों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्लैक कार्बन का असर हिमालयी ग्लेशियरों पर भी पड़ सकता है, जिससे बर्फ के तेजी से पिघलने का खतरा बढ़ जाता है। अगर इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह समस्या भविष्य में और विकराल रूप ले सकती है।

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