उत्तराखंड में ‘गोट वैली योजना’ बनी पलायन रोकने का हथियार, 5500 से अधिक ग्रामीणों को मिला रोजगार – सौरभ बहुगुणा

Date/23/08/2026

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘गोट वैली योजना’ ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रही है। पहाड़ों में भारी उद्योगों और बड़ी कंपनियों की कमी के बावजूद बकरी पालन के माध्यम से स्थानीय युवाओं और किसानों को रोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य न केवल ग्रामीणों की आय बढ़ाना है, बल्कि पलायन की समस्या पर भी प्रभावी अंकुश लगाना है। देहरादून जिले का चकराता क्षेत्र इस योजना का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। यहां की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां बकरी पालन के लिए बेहद अनुकूल हैं। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में किसान और युवा इस योजना से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा ने बताया कि राज्य सरकार ने वर्ष 2022-23 में पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने,

और किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से ‘गोट वैली योजना’ शुरू की थी। योजना को नवंबर 2023 में व्यापक स्तर पर लागू किया गया। इसका मुख्य लक्ष्य पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकना और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित करना था। उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि, पशुपालन और डेयरी व्यवसाय ही आजीविका के प्रमुख साधन हैं। ऐसे में पशुपालन विभाग उन लोगों को विशेष सहायता प्रदान करता है जो बकरी पालन के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं।

योजना के तहत लाभार्थियों को पांच बकरियों के लिए 30 हजार रुपये तक का आसान ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

इसके बाद पशुपालन विभाग की ओर से 10 बकरियां और एक बकरा मुफ्त दिया जाता है। इस प्रकार लाभार्थी के पास कुल 16 बकरी-बकरों की एक यूनिट तैयार हो जाती है, जिससे वह नियमित आय अर्जित कर सकता है। पशुपालन मंत्री ने बताया कि अब तक राज्य के लगभग साढ़े पांच हजार लोगों को इस योजना का लाभ मिल चुका है और लगातार नए लोग इससे जुड़ रहे हैं।

सौरभ बहुगुणा ने बताया कि उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के साथ सीधे जुड़कर किसानों और पशुपालकों को बाजार उपलब्ध कराया है। उन्होंने कहा कि पहले उत्तरकाशी और अन्य सीमांत क्षेत्रों के पशुपालकों को अपनी भेड़-बकरियां बेचने के लिए हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता था। कई बार उन्हें भुगतान मिलने में छह से आठ महीने तक का समय लग जाता था। लेकिन अब आईटीबीपी के साथ साझेदारी होने से यह प्रक्रिया बेहद सरल और पारदर्शी हो गई है। मंत्री ने बताया कि जब पशुपालक अपने उत्पाद बेचने के लिए तैयार होते हैं तो 48 घंटे के भीतर आईटीबीपी की टीम और पशु चिकित्सक मौके पर पहुंचकर पशुओं का स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं। इसके बाद भेड़, बकरियां और अन्य उत्पाद सीधे खरीद लिए जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसानों के खातों में 48 घंटे के भीतर भुगतान पहुंच जाता है, जिससे बिचैलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो गई है।

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