Date/30/08/2026
देहरादून। परम पूज्य आर्यिका रत्न गुरुमाँ 105 श्री पूर्णमति माताजी के पावन सान्निध्य में श्री दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर एवं जैन भवन, देहरादून में नेमीनाथ परिवार एवं विद्या सिंधु बालिका मंडल द्वारा आचार्य श्री की पूजा-अर्चना श्रद्धापूर्वक की गई। तत्पश्चात सकल दिगम्बर जैन समाज, देहरादून के सहयोग से श्री नेमी कुमार परिवार, श्रीकृष्ण परिवार एवं श्री बलराम परिवार बननेका परम सौभाग्य प्राप्त करने पर तीनों संपूर्ण परिवारों की धर्मभावना एवं पुण्य कार्य की अनुमोदना करते हुए वीर विद्या युवा मंडल द्वारा उनका सम्मान किया गया।
धर्मसभा का शुभारंभ पूज्य आर्यिका रत्न श्री पूर्णमति माताजी द्वारा णमोकार मंत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ किया गया। इस अवसर पर गुरुमाँ ने कहा कि हम अपने जीवन में कितनी बार विचार करते हैं कि हम इतना धर्म-ध्यान करते हैं, अच्छे-अच्छे कार्य करते हैं, फिर भी जीवन में शांति क्यों नहीं आती? जब तक यह भूल बनी रहेगी कि “मैं पर का कर्ता हूँ और पर मेरा कर्ता है”, तब तक वास्तविक शांति कैसे प्राप्त हो सकती है? यही सबसे बड़ी भूल है। उन्होंने कहा कि अपने को अच्छे का कर्ता मानना और बुरे का भी कर्ता मानना अज्ञानता है। कोई किसी के सुख-दुःख का कर्ता नहीं है। प्रत्येक जीव अपने भावों का ही कर्ता है। व्यक्ति अच्छा करना चाहता है, लेकिन कभी-कभी बुरा परिणाम सामने आ जाता है। प्रत्येक कार्य अपने-अपने समय और कर्मानुसार होता है।
गुरुमाँ ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक डॉक्टर मरीज को बचाने के लिए पूरी कोशिश करता है, लेकिन फिर भी मरीज की मृत्यु हो जाती है। दूसरी ओर कोई डाकू किसी व्यक्ति को मारना चाहता है, लेकिन वह व्यक्ति बच जाता है। ऐसे में फल किसका लगेगा? भाव का फल लगेगा। इसलिए अपने परिणामों को संभालना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अनादि काल से मोह की परतें जीव पर चढ़ती चली गई हैं। समय किसी का इंतजार नहीं करता। बाह्य क्रिया चाहे जैसी भी हो, किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए।