Date/25/09/2026
देहरादून। पर्वाधिराज पर्युषण दशलक्षण महापर्व के दसवें दिन अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर गांधी रोड स्थित श्री दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर सहित देहरादून के विभिन्न जैन मंदिरों में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। आध्यात्मिक श्रमणी परम पूज्य वात्सल्यमयी आर्यिका रत्न श्री 105 पूर्णमति माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की। इस अवसर पर भव्य शोभायात्रा भी निकाली गई। कार्यक्रम में देहरादून के साथ ही सागर, ललितपुर, टोंगड़गढ़, विदिशा, ऋषिकेश, मध्य प्रदेश और विकासनगर सहित विभिन्न स्थानों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धर्मलाभ प्राप्त किया। प्रातःकाल मंदिरों में नित्य नियम पूजन, दशलक्षण पूजन सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए।
भव्य शोभायात्रा में झांकियों ने मोहा मन
अनंत चतुर्दशी के अवसर पर प्रातः 11 बजे जैन भवन, गांधी रोड से भव्य शोभायात्रा प्रारंभ हुई। शोभायात्रा में भगवान श्री जी का रथ, ऐरावत हाथी और विभिन्न धार्मिक झांकियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहीं। मार्ग में श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारे लगाए और भजनों पर नृत्य कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। शोभायात्रा के मुख्य पात्रों में ख्वासी के रूप में राजीव जैन एवं पूनम जैन (देहराखास), कुबेर के रूप में संजय जैन (मल्टीचैनल), सारथी के रूप में राजेश जैन एवं अर्चना जैन (पारस टावर), इंद्र के रूप में मुदित जैन एवं अरिहंत जैन तथा ऐरावत हाथी के लिए प्रमोद जैन (जयपुर) शामिल रहे। श्री जी की महाआरती अमित जैन (टर्नर रोड) द्वारा की गई। शोभायात्रा का संचालन वर्षायोग समिति के चेयरमैन राजीव जैन (फोरम हाउस) ने जैन मिलन पारस एवं वीर विद्या युवा मंडल के सहयोग से किया।
शोभायात्रा जैन भवन, गांधी रोड से शुरू होकर सहारनपुर चैक, झंडा बाजार, अखाड़ा बाजार, मोती बाजार, मिशन स्कूल, सरनीमल बाजार, धामावाला और राजा रोड होते हुए पुनः जैन भवन पहुंची, जहां इसका समापन हुआ। शहर के विभिन्न स्थानों पर धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं ने शोभायात्रा का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया और भगवान श्री जी के रथ की आरती की।
‘ब्रह्मचर्य अर्थात आत्मा में चर्या करना’
आर्यिका श्री 105 पूर्णमति माताजी ने कहा कि उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म दशलक्षण महापर्व का दसवां और अंतिम धर्म है। ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी शुद्ध आत्मा में रमण करना और मन, वचन तथा शरीर से विषय-विकारों से दूर रहना है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ हैकृ‘ब्रह्म अर्थात आत्मा में चर्या करना।’ मन को बुरे विचारों से मुक्त रखना, वाणी में मर्यादा बनाए रखना तथा इंद्रियों और इच्छाओं पर संयम रखना भी ब्रह्मचर्य का महत्वपूर्ण स्वरूप है। दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व के दसवें दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना आत्मशुद्धि, संयम, सादगी और बाहरी आकर्षणों से विरक्ति का संदेश देती है। धर्मशाला पहुंचने के बाद भगवान श्री जी का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके बाद सायंकालीन महाआरती का आयोजन हुआ।